शांता कुमार ने बढ़ती आत्महत्याओं पर जताई चिंता, गरीबी-बेरोजगारी और आबादी को बताया बड़ी चुनौती
हिमाचल में वर्ष 2024 के दौरान 813 आत्महत्याओं का आंकड़ा चिंताजनक; देश में आर्थिक विषमता और युवाओं के भविष्य पर भी उठाए सवाल
पालमपुर, 10 अक्टूबर, रजनीश कपिल। हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री शांता कुमार ने देश और प्रदेश में बढ़ती आत्महत्याओं की घटनाओं पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश में वर्ष 2024 के दौरान 813 लोगों की आत्महत्या से जुड़ी रिपोर्ट ने उन्हें झकझोर कर रख दिया। उन्होंने गरीबी, बेरोजगारी, बढ़ती आबादी और आर्थिक विषमता को गंभीर सामाजिक चुनौतियां बताते हुए इन पर व्यापक चिंतन की आवश्यकता जताई।
शांता कुमार ने कहा कि आत्महत्याओं की बढ़ती घटनाएं केवल आंकड़े नहीं हैं, बल्कि समाज और व्यवस्था के सामने खड़े गंभीर सवाल हैं। उनके अनुसार, देश में एक वर्ष के दौरान लगभग 1.87 लाख आत्महत्याओं और इनमें 13 हजार विद्यार्थियों के शामिल होने का आंकड़ा बेहद चिंताजनक है।
गरीबी और बेरोजगारी से बढ़ रही निराशा
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि युवाओं में निराशा और हताशा के पीछे गरीबी, बेरोजगारी तथा रोजगार की अनिश्चितता जैसे कई कारण हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि आर्थिक तंगी और भविष्य को लेकर असुरक्षा युवाओं के सामने बड़ी चुनौती बनकर खड़ी हैं। इस समस्या से निपटने के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने और युवाओं को बेहतर भविष्य की उम्मीद देने की आवश्यकता है।
उन्होंने केंद्र सरकार की रोजगार एवं कल्याणकारी योजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि सरकारें रोजगार उपलब्ध करवाने के प्रयास कर रही हैं, लेकिन बढ़ती आबादी के कारण रोजगार की मांग लगातार बढ़ रही है।
बढ़ती आबादी पर जताई चिंता
शांता कुमार ने भारत की जनसंख्या में हुई वृद्धि का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्ष 1947 में देश की आबादी लगभग 38 करोड़ थी, जबकि अब यह 140 करोड़ से अधिक हो चुकी है। उनके अनुसार, जनसंख्या वृद्धि गरीबी और बेरोजगारी जैसी समस्याओं को और जटिल बना सकती है। उन्होंने इस चुनौती पर राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर चर्चा करने की आवश्यकता जताई।
आर्थिक विकास के बावजूद विषमता गंभीर मुद्दा
पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा कि भारत दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो चुका है, लेकिन इसके बावजूद गरीबी और भुखमरी जैसी समस्याएं पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। उन्होंने आर्थिक विषमता पर चिंता जताते हुए कहा कि विकास का लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुंचना चाहिए।
उन्होंने कहा कि यदि आर्थिक विकास के साथ असमानता भी बढ़ती रहती है, तो समाज के कमजोर वर्गों की मुश्किलें कम करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। इसलिए रोजगार के अवसर बढ़ाने के साथ आर्थिक असमानता कम करने पर भी ध्यान देना जरूरी है।
आत्महत्याओं की रोकथाम के लिए प्रभावी प्रयास जरूरी
शांता कुमार ने कहा कि आत्महत्याओं की बढ़ती घटनाओं को गंभीरता से समझने की आवश्यकता है। गरीबी और बेरोजगारी के अलावा मानसिक तनाव, पारिवारिक परिस्थितियां, सामाजिक दबाव और अन्य व्यक्तिगत कारण भी आत्महत्या के जोखिम को प्रभावित कर सकते हैं।
उन्होंने गरीबी, बेरोजगारी, बढ़ती आबादी और आर्थिक विषमता जैसी चुनौतियों पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता जताई। साथ ही, युवाओं के लिए रोजगार के बेहतर अवसर, सामाजिक सुरक्षा और समय पर मानसिक स्वास्थ्य सहायता उपलब्ध करवाने जैसे प्रयासों को भी महत्वपूर्ण माना जा सकता है।
उन्होंने कहा कि देश के विकास का वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा होगा, जब आर्थिक प्रगति के साथ आम लोगों के जीवन में भी सकारात्मक बदलाव आए और युवाओं को सुरक्षित एवं बेहतर भविष्य की उम्मीद मिले।
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