**28.08.2026**
### **पीजीआईएमईआर में छठे प्रो. बी. एल. तलवार स्मृति व्याख्यान में एआई के दौर में भी सर्जिकल प्रशिक्षण में गुरु के महत्व पर जोर**
### **“तकनीक हाथ का मार्गदर्शन कर सकती है, लेकिन सर्जन को केवल शिक्षक ही गढ़ सकता है”: डॉ. आर. ए. शास्त्री**
### **“आज हम जिस गौरव का अनुभव कर रहे हैं, वह हमारे संस्थापक पुरोधाओं की देन है”: प्रो. विवेक लाल**
**चंडीगढ़, 28 अगस्त 2026:** पीजीआईएमईआर के गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल सर्जरी, एचपीबी एवं लीवर ट्रांसप्लांटेशन विभाग द्वारा आयोजित **छठे प्रो. बी. एल. तलवार स्मृति व्याख्यान** में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और आधुनिक तकनीक के तेजी से बदलते दौर में सर्जिकल प्रशिक्षण में शिक्षक और पारंपरिक गुरु-शिष्य परंपरा की निरंतर प्रासंगिकता पर विशेष जोर दिया गया।
कार्यक्रम में संकाय सदस्यों, पूर्व प्रोफेसरों, सर्जनों, विद्यार्थियों और प्रतिनिधियों ने भाग लिया तथा प्रख्यात सर्जन प्रो. बी. एल. तलवार की स्थायी विरासत को याद करते हुए सर्जिकल शिक्षा के बदलते स्वरूप पर विचार-विमर्श किया।
इस अवसर पर **किम्स हॉस्पिटल्स, हैदराबाद के डॉ. आर. ए. शास्त्री** ने **“द टीचर लाइव्स ऑन: सर्जिकल विजडम फ्रॉम प्रो. बी. एल. तलवार इन द डिजिटल एरा ऑफ एआई एंड सिमुलेशन”** विषय पर व्याख्यान दिया।
लगभग पांच दशकों से पीजीआईएमईआर से अपने जुड़ाव को याद करते हुए डॉ. शास्त्री ने संस्थान में अपनी वापसी को केवल सम्मान नहीं, बल्कि **“घर वापसी जैसा अनुभव”** बताया। प्रो. तलवार के सान्निध्य में अपने शुरुआती वर्षों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि इस संस्थान ने उनके दृष्टिकोण, सर्जिकल कौशल और व्यक्तित्व को आकार दिया।
प्रो. बी. एल. तलवार को एक अनुशासनप्रिय लेकिन विद्यार्थियों के प्रति अत्यंत समर्पित गुरु के रूप में याद करते हुए डॉ. शास्त्री ने कहा कि उन्होंने अपने शिष्यों को कठिनाइयों से जूझने की स्वतंत्रता दी, लेकिन कभी असफलता के विनाशकारी परिणामों तक नहीं पहुंचने दिया। उन्होंने कहा, **“युवा सर्जन को कठिनाइयों से बचाने की नहीं, बल्कि किसी बड़ी त्रासदी से बचाने की जरूरत होती है और प्रो. तलवार ने मुझे यही संरक्षण दिया।”**
डॉ. शास्त्री ने कहा कि पारंपरिक **गुरु-शिष्य परंपरा** के माध्यम से सर्जिकल ज्ञान और अनुभव का एक ऐसा स्वरूप आगे बढ़ता है, जिसे केवल पुस्तकों या तकनीक के माध्यम से पूरी तरह नहीं सीखा जा सकता। उन्होंने कहा, **“ये केवल निर्देश नहीं, बल्कि गहरी समझ और अंतर्दृष्टि थी। यह ऐसा अनुभवजन्य ज्ञान है, जिसे केवल एक गुरु ही अपने शिष्य तक पहुंचा सकता है।”**
चिकित्सा शिक्षा में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की बढ़ती भूमिका पर चर्चा करते हुए डॉ. शास्त्री ने कहा कि एआई सिमुलेशन, साहित्य के विश्लेषण, अवधारणात्मक शिक्षा और कौशल विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है, लेकिन इसे मानवीय मार्गदर्शन का विकल्प नहीं बनने देना चाहिए।
उन्होंने कहा, **“एआई तकनीक सिखा सकती है, जटिल परिस्थितियों का सिमुलेशन कर सकती है और परिणामों का अनुमान लगा सकती है। लेकिन एआई निर्णय क्षमता, साहस, करुणा, नैतिकता और विनम्रता नहीं सिखा सकती। तकनीक हाथ का मार्गदर्शन कर सकती है, लेकिन सर्जन को केवल शिक्षक ही गढ़ सकता है।”**
संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता पर जोर देते हुए डॉ. शास्त्री ने कहा कि **तकनीक को शिक्षक का स्थान लेने के बजाय शिक्षक को अधिक सक्षम और प्रभावी बनाने का माध्यम बनना चाहिए।** उन्होंने कहा कि भविष्य का सफल सर्जन न तो एआई से दूरी बनाने वाला होगा और न ही आंख मूंदकर उसे अपनाने वाला, बल्कि वह होगा जो इसे एक सहायक साधन के रूप में उपयोग करेगा।
अपने व्याख्यान के समापन पर डॉ. शास्त्री ने प्रो. तलवार के स्थायी प्रभाव को नमन करते हुए अगली पीढ़ी से मार्गदर्शन और गुरु-शिष्य परंपरा की संस्कृति को बनाए रखने का आह्वान किया। उन्होंने कहा, **“सच्चा शिक्षक कभी नहीं मरता। वह अपने प्रशिक्षित प्रत्येक सर्जन में, हमारे हर निर्णय में और संस्थान की संस्कृति में जीवित रहता है।”** उन्होंने विद्यार्थियों से केवल जानकारी नहीं बल्कि विवेक और ज्ञान तथा केवल दक्षता नहीं बल्कि अच्छे चरित्र की खोज करने का आह्वान किया।
इस अवसर पर **पीजीआईएमईआर के निदेशक प्रो. विवेक लाल** ने संस्थान की संस्थापक पीढ़ी को भावपूर्ण श्रद्धांजलि देते हुए प्रो. बी. एल. तलवार को एक महान सर्जन बताया, जिनकी विनम्रता, मरीजों के प्रति समर्पण और विद्यार्थियों के प्रति प्रतिबद्धता आज भी पीजीआईएमईआर की कार्यसंस्कृति को परिभाषित करती है।
प्रो. लाल ने कहा, **“आज हम जिस गौरव और प्रतिष्ठा का अनुभव कर रहे हैं, वह हमारे संस्थापक पुरोधाओं की देन है। उन्होंने हमें जो विरासत सौंपी है, उसका ऋण हम कभी नहीं चुका सकते। हम केवल बार-बार उसे स्वीकार और नमन कर सकते हैं।”**
संस्थापक पीढ़ी के मूल्यों को याद करते हुए निदेशक पीजीआईएमईआर ने कहा कि उन्हें पीजीआई से प्रेम था, वे अपने मरीजों से प्रेम करते थे और अपने विद्यार्थियों से भी उतना ही लगाव रखते थे। **मरीजों की देखभाल और विद्यार्थियों के शिक्षण के सामने उनके लिए हर दूसरी प्राथमिकता गौण हो जाती थी।**
प्रो. तलवार की विनम्रता का उल्लेख करते हुए प्रो. लाल ने सेवानिवृत्ति के बाद बैंक की कतार में धैर्यपूर्वक खड़े प्रो. तलवार को देखने का प्रसंग साझा किया। उन्होंने कहा, **“वह एक महान और प्रतिष्ठित सर्जन थे, लेकिन उनका सबसे बड़ा गुण उनकी विनम्रता थी। विनम्र लोग वास्तव में बहुत मजबूत होते हैं।”**
प्रो. लाल ने कहा कि ऐसे महान व्यक्तित्वों की विरासत को केवल स्मरण तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि उनके मूल्यों और आदर्शों को व्यवहार और संस्थागत संस्कृति में उतारना चाहिए। उन्होंने कहा कि **ऐसे व्याख्यान उन महान व्यक्तित्वों की सच्ची भावना और आदर्शों के अनुरूप होने चाहिए, जिन्हें हम याद करते हैं।**
मुख्य वक्ता का परिचय देते हुए **गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल सर्जरी, एचपीबी एवं लीवर ट्रांसप्लांटेशन विभाग के प्रमुख प्रो. राजेश गुप्ता** ने डॉ. आर. ए. शास्त्री को भारत में गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल और हेपेटोपैंक्रियाटोबिलियरी सर्जरी के क्षेत्र के अग्रणी विशेषज्ञों में से एक बताया।
उन्होंने कहा कि डॉ. शास्त्री का पीजीआईएमईआर के साथ एक विशिष्ट और गौरवशाली जुड़ाव रहा है। उन्होंने संस्थान से सर्जरी में एमएस की शिक्षा प्राप्त की और उत्कृष्टता के लिए प्रतिष्ठित इंस्टीट्यूट मेडल हासिल किया। इसके बाद उन्होंने लैप्रोस्कोपिक सर्जरी तथा लीवर सर्जरी एवं प्रत्यारोपण के क्षेत्र में उन्नत प्रशिक्षण प्राप्त किया।
प्रो. गुप्ता ने बताया कि डॉ. शास्त्री ने बाद में निजाम्स इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, हैदराबाद में सर्जिकल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग की स्थापना की, जहां उन्होंने विभागाध्यक्ष और बाद में डीन के रूप में सेवाएं दीं। उन्होंने 60 से अधिक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय शोध पत्र प्रकाशित किए हैं, राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पुस्तकों में योगदान दिया है तथा विभिन्न पेशेवर सर्जिकल संस्थाओं में महत्वपूर्ण नेतृत्वकारी जिम्मेदारियां निभाई हैं।
प्रो. गुप्ता ने कहा, **“प्रो. शास्त्री उस पीढ़ी से हैं जिसने हमारी विशेषज्ञता को स्थापित किया और इसकी अकादमिक एवं पेशेवर नींव को मजबूत किया। उनके योगदान ने इस विधा के विकास को दिशा दी है और वे आज भी सर्जनों की नई पीढ़ियों को प्रेरित कर रहे हैं।”**
**पीजीआईएमईआर के डीन (अकादमिक) प्रो. संजय जैन** ने इस व्याख्यान को संस्थान की समृद्ध शैक्षणिक परंपरा की सार्थक निरंतरता बताया। उन्होंने कहा कि किसी शैक्षणिक संस्थान के लिए इससे बड़ा संतोष शायद ही कोई हो कि उसके विद्यार्थी आगे चलकर अपने क्षेत्र के नेता और शिक्षक बनकर अपने संस्थान में लौटें।
प्रो. जैन ने कहा, **“किसी भी शैक्षणिक संस्थान के लिए शायद इससे बड़ा संतोष नहीं हो सकता कि उसके विद्यार्थी अपने दम पर नेता और शिक्षक बनने के बाद अपनी मातृसंस्था में लौटकर नई पीढ़ी का मार्गदर्शन करें।”**
**छठे प्रो. बी. एल. तलवार स्मृति व्याख्यान** ने सर्जिकल उत्कृष्टता, मार्गदर्शन, विनम्रता, नैतिक चिकित्सा व्यवहार और मरीज-केंद्रित देखभाल के मूल्यों को बनाए रखने के प्रति पीजीआईएमईआर की प्रतिबद्धता को एक बार फिर रेखांकित किया। साथ ही, इसमें आधुनिक तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से उपलब्ध हो रहे नए अवसरों को संतुलित और सार्थक ढंग से अपनाने की आवश्यकता पर भी बल दिया गया। ब्यूरो रिपोर्ट : रोशन लाल शर्मा Fact live today

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